Surya
रोज शाम बगीचे में घूमने जाना मेरी आदत में शामिल था | फाटक के पास ही शर्माजी मिल गए |
वहां रुक कर कुछ देर उनसे बतियाने लगा | सावन का पहला सोमवार था | आज कुछ विशेष रौनक थी | कुछ एक गुब्बारे-कुल्फी वाले भी आ जुटे थे |
शर्माजी से जैरामजी कर आगे बढ़ने लगा तो पास में खड़े कुल्फी वाले ने कुरते की बाह पकड़ कर कहा : "बाबूजी पैसे" ?
मैं हतप्रभ: "कैसे पैसे" ?
उसने पास खड़े कुल्फी खाते एक बच्चे की तरफ़ इशारा कर के कहा : "आपका नाम ले कुल्फी ले गया है, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे" |
मुझे गुस्सा आ गया बच्चे के पास गया और दो थप्पड़ जड़ दिए और कहा "मुफ्त की कुल्फी खाते शर्म नही आती" ?
वह बोला : "मुफ्त की कहाँ ? इसके बदले थप्पड़ खाने के लिए तो आपके पास खड़ा था वरना भाग ना जाता"?
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विनय के जोशी
Surya
लड़के ने धीमी होती रेल की खिड़की के बाहर देखा तो लगा साक्षात चाँद धरा पर उतर आया हो| अलसी भौर में उनींदे नयन सीप | अपलक देखता ही रह गया | कुछ संयत हो, हाथ में पानी की केतली ले उतरा और वहां चला, जहाँ वह मानक सौंदर्य मूर्ति जल भर रही थी | फासला कम होता गया, सम्मोहन बढ़ता गया | समक्ष पहुँचने तक दोनों के मध्य स्मित अवलंबित नजर सेतु स्थापित हो चुका था | भावनाओं का परिवहन होने लगा | लड़के ने देखा लड़की की पगतली पर महावर रची थी | किसी परिणय यात्रा की सदस्या थी | बालों से चमेली की खुशबू का ज्वार सा उठा, लड़का मदहोश हो गया | कलाई थाम ली, हथेली पर रचे मेहंदी के बूटों पर अधर रख दिये | लड़की की पलकें गिर गई | तभी लड़की के पास खड़ा पानी भरता एक मुच्छड़ मुड़ा | अग्नि उद्वेलित नजरों से घूरा और अपने हाथ को लडके की कनपट्टी की दिशा में घुमा दिया | लड़का झुका और स्वयं को बचाया | इतने में उसकी ट्रेन खिसकने लगी | वह लपक कर चढ़ गया | दूसरी तरफ़ उनकी की ट्रेन भी चल पड़ी | वह मुच्छड़ के साथ घसीटती सी चली | गति पकड़ती ट्रेन की खिड़की से एक मेहंदी रची हथेली हिल रही थी | लड़का आंख में पड़ा कोयला मसलने लगा |
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विनय के जोशी
Surya
पौ फटते ही उसने लिखना शुरू कर दिया था। एक झोंपड़े की दीवार पर लिखते ही साइकिल उठा, अगली दीवार ढूँढ़ने लगता। एक दीवार पर लिखने के उसे दो रुपये मिलते थे। ठेकेदार ने कहा था, शाम होने से पहले पचास दीवारें लिखी होनी चाहिये। उसे लक्ष्य प्राप्त होने का विश्वास था, लेकिन चार बजते-बजते वह थक कर चूर हो गया। पूरा बदन दर्द कर रहा था। कलाई का दर्द तो सहा ही नहीं जा रहा था। उसे लगा अब वह और नहीं लिख पायेगा। गेरु से भरी बाल्टी और ब्रश एक तरफ रख दीवार के सहारे, माथा पकड़ कर बैठ गया। अभी बैठा ही था, कि ठेकेदार की मोटर साईकिल आ कर रुकी।
- ’अरे उठ ! अभी तो बहुत सा लिखना है, कल सुबह जब स्वास्थ मंत्री इधर से गुजरें तो सड़क से दीखती हर दीवार पर लिखा होना चाहिये। ’
- ’मालिक बदन का पोर-पोर दुख रहा है। सुबह से कुछ नहीं खाया। अंगुलियां से ब्रश नहीं पकड़ा जा रहा।’ फटे बनियान में वह ठंड से कांपता हुआ बोला।
ठेकेदार को दया आ गई उसने मोटर साइकिल की डिक्की में हाथ डाला, एक बोतल निकाली और बोला ’ले दो घूँट लगा ले सब ठीक हो जायेगा।’ उसकी आँखों में चमक आ गई। अब वह लक्ष्य प्राप्त कर लेगा । दो की बजाय बड़े-बड़े पाँच घूंट हलक में उतार लिये और नये उत्साह से नशामुक्ति के नारे लिखने लगा।
..............दारू दानव से करो किनारा। आगे बढ़ता देश हमारा।
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विनय के जोशी
Surya
सुनील के यहाँ दो लड़कियों पर लड़का हुआ था। सो हम पति-पत्नी उसे बधाई देने पहुँचे थे। कॉल बेल बजाने ही वाला था कि अन्दर से जोर-जोर से लड़ाई की आवाज सुनकर ठहर गया।
''पापा आप खुश होते रहे अपने लाडले के जन्म पर। हमें आप के इस कार्य से बहुत ठेस पहुँची है।"
आवाज़ उनकी बड़ी बेटी इला की थी ।
''बेटी क्या कह रही हो तुम- क्या तुम्हें अपने भाई के जन्म पर खुशी नहीं है।"
''आप मेल शाऊन्जिम (पुरूषतावादी) की बात कर रहे हैं मैं बारहवीं में तथा इड़ा नवीं में है
आप की उम्र अड़तालीस व मम्मी की चव्वालीस वर्ष है क्या आपके दो बेटियों की जगह दो बेटे होते तब भी आप एक बेटी पैदा करते, भ्रूण जाँच करवाते?" इला झपटते हुए कह रही थी।
''बेटे वंश चलाने के लिए' सुनील की पत्नी की मरी सी आवाज निकली।
''बस चुप करिये मम्मी। और हाँ, आप दोनो सुन लीजिए अगर आपने बेटा होने का जश्र मनाया तो मैं और इड़ा मुँह पर पट्टी बाँधकर मूक विरोध करेंगे। समझे?"
यह सुन कर हम पति-पत्नि ने बिना बधाई के वापिस लौटने में गनीमत समझी ।
--श्याम सखा 'श्याम'