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Surya
खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही


कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया
हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही

मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा
या यूँ कहो कि बर्क़ की दहशत नहीं रही

हमको पता नहीं था हमें अब पता चला
इस मुल्क में हमारी हक़ूमत नहीं रही

कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे
कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
रो—रो के बात कहने की आदत नहीं रही

सीने में ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी
गो ज़िन्दगी की कोई ज़रूरत नहीं रही

-दुष्यंत कुमार
Surya

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

-- दुष्यंत कुमार

Surya
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है!

सूर्य हमने भी नही देखा ही शुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है?

इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछा है,
हर किसी का पाँव घुटने तक सना है!

पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है की कोई पुल बना रहा है।

रक्त वर्षो से नशों में खौलता है,
आप कहतें हैं क्षणिक उत्तेजना है!!!!!!

हो गई है हर घाट पर पूरी व्यवस्था।
शौक से डूबिये जिसे भी डूबना है!!

दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नही है,
आज कल नेपथ्य में संभावना है।

--दुष्यंत कुमार